"तेरी दुनिया तेरी उम्मीद तुझे मिल जाए,
चाँद इस बार तेरी ईद तुझे मिल जाए,
जिसकी यादों में चिरागों सा जला है शब-भर,
उस सहर-रुख की कोई दीद तुझे मिल जाए...!!!"
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"जब आता है जीवन में ख्यालातों का हंगामा,
ये जज्बातों, मुलाकातों, हंसी रातों का हंगामा,
जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब,
ये हंगामे की रातें हैं, या है रातों का हंगामा...!!!"
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"भ्रमर कोई कुमुदिनी पर मचल बैठा तो हंगामा,
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा,
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का,
मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हंगामा...!!!
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"कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है,
मगर धरती की बेचैनी को, बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है...!!!"
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मैं जिसे मुद्दत में कहता था, वो पल की बात थी
आप को भी याद होगा आज कल की बात थी
आप के आँसू से जाना पक्ष और प्रतिपक्ष मैं
आप की मुस्कान तो बस एक दल की बात थी
रोज़ मेला जोड़ते थे वो समस्या के लिए
और उनकी जेब में ही बंद हल की बात थी
उस सभा में सभ्यता के नाम पर जो मौन था
बस, उसी के कथ्य में मौजूद तल की बात थी
मैं मरुस्थल था अगर तो सिर्फ दुनिया के लिए
आप की खातिर तो मेरे दिल में जल की बात थी
नीतियाँ झूठी हुईं और शास्त्र भी घबरा गए
झोंपड़ी के सामने जब भी महल की बात थी
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मैं भाव सूची उन भावों की, जो बिके सदा ही बिन तोले
तन्हाई हूँ हर उस ख़त की, जो पढ़ा गया है बिन खोले ||
कुछ कहते हैं मैं सीखा हूँ, अपने जख्मो को खुद सीकर
कुछ कहते हें में हँसता हूँ , भीतर भीतर आंसू पीकर
कुछ कहते हैं में हूँ विरोध से, उपजी एक खुद्दार विजय
कुछ कहते हैं मैं रचता हूँ, खुद मैं मरकर खुद में जीकर
लकिन मैं हर चतुराई की, सोची समझी नादानी हूँ
लव कुश ही पीर बिना गाई, सीता की राम कहानी हूँ...!!!
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"नज़र में शोख़ियाँ लब पर मुहब्बत का तराना है,
मेरी उम्मीद की ज़द में अभी सारा ज़माना है,
कई जीते हैं दिल के देश पर मालूम है मुझको,
सिकंदर हूँ मुझे इक रोज़ ख़ाली हाथ जाना है...!!!"
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मैं भाव सूची उन भावों की, जो बिके सदा ही बिन तोले
तन्हाई हूँ हर उस ख़त की, जो पढ़ा गया है बिन खोले ||
जिनके सपनों के ताजमहल, बनने से पहले टूट गए
जिन हाथों में दो हाथ कभी, आने से पहले छूट गए
धरती पर जिनके खोने और, पाने की अजब कहानी है
किस्मत की देवी मन गयी, पर प्रणय देवता रूठ गए
मैं मैली चादर वाले उस, कबिरा की अम्रत वाणी हूँ
लुव कुश की पीर ..............................................||
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मैं भाव सूची उन भावों की, जो बिके सदा ही बिन तोले
तन्हाई हूँ हर उस ख़त की, जो पढ़ा गया है बिन खोले ||
हर आंसू को हर पत्थर तक, पहुचाने की लाचार हूक
मैं सहज अर्थ उन शब्दों का, जो कहे गए हैं बिन बोले
जो कभी नहीं बरसा खुल कर, मैं उस बादल का पानी हूँ
लव कुश की पीर, बिना गाई, सीता की राम कहानी हूँ
मैं भाव सूची .....................................................||
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खुद से भी मिल न सको, इतने पास मत होना
इश्क़ तो करना, मगर देवदास मत होना
देखना, चाहना, फिर माँगना, या खो देना
ये सारे खेल हैं, इनमें उदास मत होना
जो भी तुम चाहो, फ़क़त चाहने से मिल जाए
ख़ास तो होना, पर इतने भी ख़ास मत होना
किसी से मिल के नमक आदतों में घुल जाए
वस्ल को दौड़ती दरिया की प्यास मत होना
मेरा वजूद फिर एक बार बिखर जाएगा
ज़रा सुकून से हूँ, आस-पास मत होना
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"बस्ती-बस्ती घोर उदासी पर्वत-पर्वत खालीपन,
मन हीरा बेमोल लुट गया, घिस-घिस रीता तन चन्दन,
इस धरती से उस अम्बर तक, दो ही चीज गज़ब की है,
एक तो तेरा भोलापन है, एक मेरा दीवानापन...!!!
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"न पाने की ख़ुशी है कुछ, न खोने का ही कुछ ग़म है
ये दौलत और शोहरत सिर्फ कुछ ज़ख्मों का मरहम हैं
अजब सी कश्मकश है रोज़ जीने रोज़ मरने में
मुक़म्मल ज़िन्दगी तो है, मगर पूरी से कुछ कम है"
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हर पल के गुंजन की स्वर-लय-ताल तुम्ही थे,
इतना अधिक मौन धारे हो, डर लगता है,
तुम कि नवल- गति अंतर के उल्लास-नृत्य थे,
इतना अधिक ह्रदय मारे हो, डर लगता है,
तुमको छू कर दसों दिशाएं, सूरज को लेने जाती थी,
और तुम्हारी प्रतिश्रुतियों पर, बांसुरियां विहाग गाती थी,
तुम कि हिमालय जैसे, अचल रहे जीवन भर,
अब इतने पारे-पारे हो डर लगता है,
तुम तक आकर दृष्टि-दृष्टि की प्रश्नमयी जड़ता घटती थी,
तुम्हें पूछ कर महासृष्टि की हर बैकुंठ कृपा बंटती थी,
तुम कि विजय के एक मात्र पर्याय-पुरुष थे,
आज स्वयं से ही हारे हो डर लगता है...!!!
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मेरे मन तेरे पागलपन को
कौन बुझाये तेरी ठंडी अगन को
दुनिया के मेले में
घूमे अकेले तू
काहे को यादों से खेले
खुद से क्यूँ भागे रे
रातों को जागे रे
खुशियां भी गम जैसे झेले
जागती आँखों में
कैसे वो उतरे
नीदें तो दे रे सपन को
मेरे मन तेरे पागलपन को
रातों में चंदा है,
दिन में है सूरज,
हर सू उजालों के घेरे
आँखों की खाई में
छुप के जो बैठे है वो
कटते नहीं है अंधेरे
अपनी चलाता है
रोता है गाता है
काहे सताये रे तन को
मेरे मन तेरे पागलपन को
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